Tuesday, April 14, 2026

वक्त के पन्ने-एक छात्रा से समाज सेविका बनने की कहानी

"कभी-कभी अपनी पुरानी फोटो देखना वाकई बहुत सुखद अहसास देता है..."
आज जब मैंने अपने पुराने ब्लॉग से इन तस्वीरों को निकालकर यह कोलाज बनाया, तो मानो वक्त थम सा गया। यह तस्वीर साल 1990 की है, जब मैं CCS HAU, हिसार के प्रतिष्ठित परिसर में Family Resource Management में अपनी M.Sc. कर रही थी। वह दौर सादगी का था, सपनों का था और कुछ कर गुजरने के जज्बे का था। उस समय की गई वह पढ़ाई और मेहनत ही थी, जिसने आज मुझे इस मुकाम पर पहुँचाया है। रिटायरमेंट के बाद भी मेरा सफर थमा नहीं है; आज एक NGO की प्रेसिडेंट/सेक्रेटरी के रूप में मैं महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) के उसी लक्ष्य की ओर बढ़ रही हूँ, जिसकी नींव शायद उन्हीं दिनों रखी गई थी। कल ही की बात लगती है जब हम कैंपस में संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के गुर सीखते थे, और आज उन्हीं अनुभवों को समाज की महिलाओं के साथ साझा करते हुए, उन्हें जागरूक और सशक्त बनाने में एक अलग ही सुकून मिलता है। हाल ही में फरवरी में आयोजित 'कंज्यूमर अवेयरनेस' वर्कशॉप की सफलता ने यह अहसास दिलाया कि शिक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती; वह बस समय के साथ नया रूप ले लेती है। यह कोलाज सिर्फ तस्वीरों का संग्रह नहीं, बल्कि मेरी पहचान के अलग-अलग रंग हैं—कभी एक विद्यार्थी के रूप में, कभी एक प्रोफेशनल के रूप में और आज एक समाज सेविका के रूप में। यादें पुरानी हैं, लेकिन उनसे मिलने वाली प्रेरणा आज भी उतनी ही ताज़ा है। xoxo

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