Thursday, April 23, 2026
वा का अटूट बंधन: भगिनी निवेदिता के पदचिह्नों पर महिला सुरक्षा समिति का सफर
इतिहास के पन्नों में कई ऐसे व्यक्तित्व छिपे हैं जिनका भारत के उत्थान में अमूल्य योगदान रहा है. इन्हीं में से एक थीं स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता. 28 अक्टूबर 1867 को मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल के रूप में जन्मी इस महिला ने 30 वर्ष की आयु में भारत को अपना घर बनाया और यहाँ की महिलाओं के उत्थान के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया .
1898 में कोलकाता के बागबाजार में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया. वे मानती थीं कि केवल शिक्षा ही समाज की कुरीतियों से लड़ने का एकमात्र शस्त्र है.
हमारी प्रेरणा और कार्य
आज जब मैं अपने कंप्यूटर पर 2010 में सहेज कर रखी गई भगिनी निवेदिता की फाइल को देखती हूँ, तो मुझे गर्व होता है कि हमारी संस्था, महिला सुरक्षा समिति (हिसार), भी उसी विचारधारा पर आगे बढ़ रही है.
1992 में डॉक्टर कौशल्या मल्होत्रा (प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ, चूड़ामणि अस्पताल) के नेतृत्व में पंजीकृत हुई इस संस्था की जिम्मेदारी जब उन्होंने मुझे सौंपी, तब से हमारा लक्ष्य भी वही रहा है— वंचित वर्ग की बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाना.
Double click for larger image
बदलाव की एक कहानी:
हुनर से आत्मनिर्भरता: पटेल नगर की वाल्मीकि कॉलोनी में जहाँ कभी लोग लड़कियों को बाहर भेजने से कतराते थे, आज वहाँ की लड़कियाँ सिलाई-कढ़ाई, मैक्रम, क्रोशिया, राखियां बनाना, ब्यूटी पार्लर कोर्सऔर खिलौने बनाने जैसे हुनर सीख रही हैं।
शिक्षा और रोजगार: हमें खुशी है कि हमारी कई छात्राओं ने हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से सर्टिफिकेट कोर्स पूरा कर गुरुग्राम जैसे शहरों में नौकरियां प्राप्त की हैं.
आधुनिक शिक्षा: आज हमारी बेटियाँ न केवल स्कूल जा रही हैं, बल्कि कंप्यूटर और ट्यूशन के माध्यम से समाज में अपनी पहचान बना रही हैं.
स्वामी विवेकानंद और भगिनी निवेदिता के आदर्श मेरे और मेरे परिवार के लिए हमेशा मार्गदर्शक रहे हैं। जैसे निवेदिता ने माँ शारदा के आशीर्वाद से शिक्षा की ज्योति जलाई थी, वैसे ही हम भी हिसार की गलियों में स्वावलंबन की मशाल जलाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं .
नमन ऐसी महान विभूतियों को.
xoxo
Tuesday, April 14, 2026
वक्त के पन्ने-एक छात्रा से समाज सेविका बनने की कहानी
"कभी-कभी अपनी पुरानी फोटो देखना वाकई बहुत सुखद अहसास देता है..."
आज जब मैंने अपने पुराने ब्लॉग से इन तस्वीरों को निकालकर यह कोलाज बनाया, तो मानो वक्त थम सा गया। यह तस्वीर साल 1990 की है, जब मैं CCS HAU, हिसार के प्रतिष्ठित परिसर में Family Resource Management में अपनी M.Sc. कर रही थी।
वह दौर सादगी का था, सपनों का था और कुछ कर गुजरने के जज्बे का था। उस समय की गई वह पढ़ाई और मेहनत ही थी, जिसने आज मुझे इस मुकाम पर पहुँचाया है। रिटायरमेंट के बाद भी मेरा सफर थमा नहीं है; आज एक NGO की प्रेसिडेंट/सेक्रेटरी के रूप में मैं महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) के उसी लक्ष्य की ओर बढ़ रही हूँ, जिसकी नींव शायद उन्हीं दिनों रखी गई थी।
कल ही की बात लगती है जब हम कैंपस में संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के गुर सीखते थे, और आज उन्हीं अनुभवों को समाज की महिलाओं के साथ साझा करते हुए, उन्हें जागरूक और सशक्त बनाने में एक अलग ही सुकून मिलता है। हाल ही में फरवरी में आयोजित 'कंज्यूमर अवेयरनेस' वर्कशॉप की सफलता ने यह अहसास दिलाया कि शिक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती; वह बस समय के साथ नया रूप ले लेती है।
यह कोलाज सिर्फ तस्वीरों का संग्रह नहीं, बल्कि मेरी पहचान के अलग-अलग रंग हैं—कभी एक विद्यार्थी के रूप में, कभी एक प्रोफेशनल के रूप में और आज एक समाज सेविका के रूप में।
यादें पुरानी हैं, लेकिन उनसे मिलने वाली प्रेरणा आज भी उतनी ही ताज़ा है।
xoxo
Subscribe to:
Posts (Atom)

